छत्तीसगढ़ के बड़े डोंगर क्षेत्र में स्थित नकटी देवरली एक ऐसी प्राचीन धरोहर है, जो इतिहास, रहस्य और लोकमान्यताओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। यह स्थल अपनी अधूरी संरचना और अनूठी कहानी के कारण क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।

स्थानीय हल्बी भाषा में मंदिर को ‘देवरली’ कहा जाता है। इसी कारण इस प्राचीन मंदिर को नकटी देवरली के नाम से जाना जाता है। बड़े डोंगर के दक्षिण दिशा में तालगुड़ा के नीचे स्थित इस स्थल पर एक प्राचीन मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद हैं, जो अतीत की भव्यता का संकेत देते हैं।

जनश्रुतियों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण दो देवस्थलों के साथ-साथ प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि जब एक अन्य मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया, तब इस मंदिर का कार्य भी जारी था। लेकिन निर्माण कार्य के दौरान किसी कारणवश इसमें विलंब हुआ, जिससे निर्माणकर्ताओं ने इसे अधूरा ही छोड़ दिया।

इसी अधूरेपन के कारण इसे ‘नकटी देवरली’ कहा जाने लगा। समय के साथ यह मंदिर खंडहर में तब्दील हो गया और यहां के पत्थर चारों ओर बिखर गए। आज भी वहां विशाल वृक्षों और झाड़ियों के बीच यह स्थल अपनी पुरातात्विक पहचान बनाए हुए है।

दिलचस्प बात यह है कि यहां किसी देवी-देवता की प्रतिमा स्थापित नहीं है, इसलिए इस स्थान पर नियमित पूजा-अर्चना या धार्मिक आयोजन नहीं होते। इसके बावजूद, यह स्थल अपने ऐतिहासिक महत्व और रहस्यमयी वातावरण के कारण लोगों को आकर्षित करता है।

नकटी देवरली केवल एक अधूरा मंदिर नहीं, बल्कि अतीत की उस कहानी का प्रतीक है, जो आज भी समय की धूल में दबे रहस्यों को समेटे हुए है। इसके संरक्षण और अध्ययन से क्षेत्र के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है।

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