नामकरण और प्राचीन संदर्भ कांकेर रियासत का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प इसका नामकरण भी है। प्राचीन शिलालेखों और ताम्रपत्रों में इसे ‘काकराय’ या ‘कांकेर’ कहा गया है। भाषाई दृष्टि से, ‘काक’ शब्द का संबंध कौए से जोड़ा जाता है, जिससे यह धारणा बनी कि यह क्षेत्र कभी घने वनों से आच्छादित था जहाँ पक्षियों का भारी जमावड़ा रहता था। ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र ‘कंकन’ प्रदेश का हिस्सा था, जो मध्य भारत के प्राचीन व्यापारिक और सामरिक मार्गों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से सुरक्षित बनाती थी, क्योंकि यह उत्तर में दुर्ग और रायपुर जैसे मैदानी क्षेत्रों और दक्षिण में बस्तर के दुर्गम वनों के बीच एक द्वार (Gateway) की तरह कार्य करता था।

सोमवंशी राजवंश की जड़ें और प्रवास कांकेर के राजवंश का संबंध ओडिशा के जगन्नाथपुरी के सोमवंशी क्षत्रियों से माना जाता है। इस रियासत की स्थापना के पीछे एक मर्मस्पर्शी लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा वीर कान्हरदेव, जो जगन्नाथपुरी के शासक थे, कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए थे। उस युग में इस व्याधि को ईश्वरीय प्रकोप माना जाता था, जिसके कारण उन्हें अपना राजपाट त्यागना पड़ा। वे तीर्थाटन और शांति की खोज में सिहावा के जंगलों में पहुँचे, जो अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रृंगी ऋषि के आश्रम के लिए विख्यात था। यहाँ के शांत वातावरण और पवित्र जल से उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिला, जिससे प्रभावित होकर स्थानीय आदिवासियों और निवासियों ने उन्हें अपना राजा स्वीकार कर लिया।

सिहावा से कांकेर: सत्ता का केंद्र परिवर्तन सोमवंशी राजाओं ने सिहावा को अपनी पहली कर्मभूमि बनाया और वहाँ लगभग 18 पीढ़ियों तक शासन किया। सिहावा से प्राप्त शक संवत 1114 का शिलालेख इस बात का पुख्ता पुरातात्विक प्रमाण है कि 12वीं शताब्दी के आसपास यह वंश पूरी तरह स्थापित हो चुका था। समय के साथ राज्य का विस्तार हुआ और सुरक्षा की दृष्टि से एक सुदृढ़ केंद्र की आवश्यकता महसूस हुई। इसी क्रम में, वंश के तीसरे प्रभावशाली राजा ने कांकेर परगना को जीतकर उसे अपने अधीन किया और अपनी राजधानी को सिहावा के ऊँचे पहाड़ों से हटाकर महानदी के तट पर बसे कांकेर में स्थानांतरित कर दिया।

सांस्कृतिक और भौगोलिक ताना-बना कांकेर रियासत केवल युद्धों और राजाओं की कहानी नहीं है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति और राजशाही के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। महानदी के उद्गम स्थल के समीप होने के कारण यह क्षेत्र जल संपदा से समृद्ध रहा है। पश्चिम में चांदा (वर्तमान महाराष्ट्र) और दक्षिण में बस्तर की सीमाओं से घिरे होने के कारण यहाँ की कला और भाषा पर बहु-भाषी प्रभाव देखा जाता है। आज भी कांकेर का महल और यहाँ के प्राचीन मंदिर उस वैभवशाली अतीत की गवाही देते हैं, जब यह छोटी सी रियासत अपने स्वाभिमान और न्यायप्रिय शासन के लिए मध्य भारत में जानी जाती थी।

कांकेर रियासत का इतिहास केवल राजधानी परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महानदी के तट पर फली-फूली एक ऐसी सभ्यता है जहाँ राजसी परंपराओं और आदिवासी संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहाँ इस रियासत के कुछ प्रमुख राजाओं, वास्तुकला और उनके शासन की विशिष्टताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है:

प्रमुख शासक और उनका योगदान सोमवंशी राजाओं में महाराज धीराज देव का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। उनके काल में रियासत ने न केवल अपनी सीमाओं को सुरक्षित किया, बल्कि कला और साहित्य को भी संरक्षण दिया। आधुनिक काल में, महाराजा नरहर देव (1853-1903) का शासनकाल कांकेर के लिए ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है। उन्होंने शिक्षा और जनकल्याण के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किए। उनके समय में ही कांकेर में व्यवस्थित कचहरी, जेल, और स्कूल जैसी संस्थाओं का निर्माण हुआ। उनके बाद महाराज भानुप्रताप देव ने सत्ता संभाली, जिन्हें आज भी उनकी न्यायप्रियता और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए याद किया जाता है। उनके सम्मान में ही कांकेर के प्रसिद्ध ‘भानुप्रतापदेव कॉलेज’ का नामकरण किया गया है।

कांकेर पैलेस: स्थापत्य का बेजोड़ नमूना कांकेर का राजमहल (Kanker Palace) इस रियासत की शान का प्रतीक है। यह महल अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें औपनिवेशिक (Colonial) और भारतीय शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है। महल के चारों ओर फैले बगीचे और इसकी भव्य सीढ़ियाँ उस समय के राजसी ठाठ-बाट को दर्शाती हैं। वर्तमान में इस महल का एक हिस्सा ‘हेरिटेज होटल’ के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जो दुनिया भर के पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक विरासत से रूबरू कराता है। यह महल न केवल राजा का निवास था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चर्चाओं का केंद्र भी रहा है।

धर्म और संस्कृति का संरक्षण कांकेर के राजाओं ने धार्मिक सहिष्णुता और लोक-संस्कृति को हमेशा सर्वोपरि रखा। महानदी के उद्गम स्थल सिहावा और कांकेर के आसपास के क्षेत्रों में कई प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार इन राजाओं द्वारा कराया गया। शीतला मंदिर और गढ़िया पहाड़ की तलहटी में स्थित धार्मिक स्थल यहाँ की आस्था के मुख्य केंद्र हैं। गढ़िया पहाड़ स्वयं में एक प्राकृतिक किला है, जहाँ प्राचीन काल में युद्ध के समय राजा और प्रजा शरण लिया करते थे। यहाँ का ‘सोनई-रुपई’ तालाब आज भी उन लोक कथाओं को जीवित रखता है जो राजा की दो पुत्रियों के बलिदान और शौर्य से जुड़ी हैं।

दशहरा और सामाजिक समरसता बस्तर के विश्वप्रसिद्ध दशहरे की तरह कांकेर का दशहरा भी अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। यहाँ के राजाओं ने यह सुनिश्चित किया कि राजशाही के उत्सवों में स्थानीय जनजातियों (जैसे गोंड और हलबा समुदाय) की भागीदारी अनिवार्य हो। शस्त्र पूजा और शाही सवारी के दौरान जिस तरह से राजा अपनी प्रजा से मिलते थे, वह इस रियासत की लोकतांत्रिक जड़ों को दर्शाता है। आज भी कांकेर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य यहाँ के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोक-उत्सवों में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जो इतिहास और आधुनिकता के बीच एक अटूट सेतु का काम करता है।

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