छत्तीसगढ़ राज्य न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से भी इसका एक विशेष महत्व है। विशेषकर प्राचीन शैलचित्रों (Rock Paintings) के मामले में यह क्षेत्र पूरे विश्व में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान रखता है। इसी ऐतिहासिक कड़ी में रायगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 10 मील की दूरी पर आग्नेय दिशा में स्थित ‘कबरा पहाड़’ प्रागैतिहासिक कला का एक विश्व प्रसिद्ध और उत्कृष्ट उदाहरण बनकर खड़ा है।

आदिमानव की जीवनशैली और कला का उदय पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के गहन अध्ययन के अनुसार, आज से हज़ारों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में जब मानव सभ्यता अपने शुरुआती दौर में थी, तब आदिमानव इन्हीं दुर्गम पहाड़ों और गुफाओं को अपना सुरक्षित आश्रय स्थल बनाते थे। उस समय उनका संपूर्ण जीवन पूरी तरह से प्रकृति और घने वनों पर ही निर्भर था। वे वनों में जंगली जानवरों का शिकार करके और कंद-मूल खाकर अपना जीवन यापन करते थे।

आश्चर्य और कौतूहल की बात यह है कि आधुनिक सुविधाओं के पूर्ण अभाव वाले उस युग में भी इन गुफावासी मानवों के भीतर कला का बीजारोपण हो चुका था। उन्हें चित्रकला और प्राकृतिक रंगों का बुनियादी ज्ञान था। अपनी इसी समझ का उपयोग करके उन्होंने अपनी गुफाओं और पहाड़ों की कठोर चट्टानों को अपना कैनवास बनाया और अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को उन पर हमेशा के लिए उकेर दिया।

लाल रंग से उकेरे गए जीवन के प्रतिबिंब कबरा पहाड़ की चट्टानों की भित्तियों (दीवारों) पर उकेरे गए ये सभी चित्र मुख्य रूप से प्राकृतिक लाल रंग से बनाए गए हैं। इन भित्तिचित्रों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि आदिमानव ने अपने दैनिक जीवन और विशेष रूप से शिकार से जुड़ी परिस्थितियों को ही अपनी कला का मुख्य विषय (Theme) बनाया था। इन चित्रों में तत्कालीन मानव के जीवन का सजीव प्रतिबिंब साफ झलकता है।

इन ऐतिहासिक भित्तिचित्रों में मुख्य रूप से घड़ियाल, सांभर और जंगल के अन्य पशुओं की आकृतियों को बड़ी ही स्पष्टता से दर्शाया गया है। पशुओं के अलावा, इन चित्रों में एक कतार में खड़े होकर सामूहिक नृत्य करते हुए मनुष्यों की आकृतियां भी मौजूद हैं। ये नृत्यरत्त आकृतियां बेहद खास हैं क्योंकि ये उस समय के मानव के सामाजिक जुड़ाव और उनके मनोरंजन के तरीकों की ओर इशारा करती हैं।

हज़ारों साल पुराना ऐतिहासिक दस्तावेज़ घने जंगलों और पर्वतों के बीच स्थित चट्टानों पर यत्र-तत्र बिखरे प्राचीन मानव की चित्रकला के ये अनमोल अवशेष केवल तस्वीरें भर नहीं हैं, बल्कि यह मानव इतिहास के एक बहुत बड़े कालखंड का जीता-जागता दस्तावेज़ हैं। इतिहासकारों और विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये ऐतिहासिक शैलचित्र लगभग 20 हज़ार से लेकर 50 हज़ार वर्ष पूर्व के हो सकते हैं। कबरा पहाड़ की यह अनमोल धरोहर हमें हमारे अतीत की गहराइयों में ले जाती है और यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि हज़ारों साल पहले भी मानव मन में कला और अपनी कहानी बयां करने की कितनी गहरी लालसा मौजूद थी।

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