छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध जनजातीय विरासत के लिए विश्व भर में विख्यात है। यहाँ की जनजातियाँ आज भी अपनी आदिम प्रवृत्तियों, प्राचीन परंपराओं और संस्कृति को सहेजते हुए घने जंगलों के बीच निवास करती हैं। इनके अनूठे रीति-रिवाज, उत्सव, पर्व और लोक संगीत बाहरी दुनिया के लिए हमेशा से ही कौतूहल और आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इन समुदायों के लोग स्वभाव से भोले-भाले, सहज और आत्मीय होते हैं। उनकी सहनशीलता धरती के समान, धैर्य पर्वत जैसा और चरित्र गंगा जल की तरह पवित्र माना जाता है।
विशेष रूप से छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल आदिम संस्कृतियों का एक अक्षय भंडार है। यहाँ मुरिया, माड़िया, भतरा और हल्बा जैसी विभिन्न जनजातियाँ एक साथ निवास करती हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट गीत, संगीत और नृत्य की परंपराएँ हैं। इन्हीं परंपराओं में चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) के दौरान ‘चइत परब’ मनाने और इसके विशेष लोकगीत गाने की एक अत्यंत सुंदर और महत्वपूर्ण प्रथा है।
चैत्र के इस पावन पर्व पर गाए जाने वाले गीतों में प्रकृति और मानवीय भावनाओं का सुंदर समन्वय मिलता है। इन गीतों की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
“ए लेकी चो खेलुक जातोरे, केवई नी फिटे… फिटू आय कसन जाले, ए चंपा फूलों, ए मोंगुरा फूलों… सरली रे जुआन लेकी बाय जन जालो… ए लेका चो बुलुक जाटोरे, केवई नी फिटे… फिटू आय कसन जाले, ए डूमर फूलों ए सेमर फूलों… सरली रे खोड्या लेका बाय जन जालो…”
ये गीत न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ये बस्तर की जनजातियों के जीवन दर्शन, उनके परिवेश और उनकी प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम को भी अभिव्यक्त करते हैं। इन गीतों में चंपा, मोंगरा, डूमर और सेमर जैसे स्थानीय फूलों का जिक्र इनके प्राकृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।

