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    Home»कहानियाँ»दंतेवाड़ा के ‘धन्वंतरि’: डॉ. रामचंद्र और सुनीता गोडबोले
    कहानियाँ

    दंतेवाड़ा के ‘धन्वंतरि’: डॉ. रामचंद्र और सुनीता गोडबोले

    हमर गोठBy हमर गोठJanuary 27, 20263 Mins Read
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    डॉ. रामचंद्र त्रयम्बक गोडबोले और उनकी धर्मपत्नी सुनीता गोडबोले का नाम छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले में सेवा, समर्पण और निस्वार्थ चिकित्सा का पर्याय बन चुका है। बस्तर के हीरानार स्थित ‘विवेकानंद आरोग्य धाम’ के माध्यम से इस दंपति ने पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से वनवासियों के जीवन में स्वास्थ्य का उजियारा फैलाया है।

    गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर भारत सरकार द्वारा इन दोनों को संयुक्त रूप से पद्मश्री (Padma Shri) से सम्मानित करने की घोषणा, इनके वर्षों के कठिन परिश्रम का फल है।

    मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. रामचंद्र गोडबोले पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन उनकी आत्मा एक समाज सेवक की है। 1990 के दशक में, जब बस्तर का अंदरूनी इलाका बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा था और नक्सलवाद का प्रभाव बढ़ रहा था, तब इस दंपति ने सुख-सुविधाओं वाले शहरी जीवन को छोड़कर दंतेवाड़ा को अपनी कर्मभूमि चुना।

    1. विवेकानंद आरोग्य धाम: एक जीवन रक्षक केंद्र

    डॉ. गोडबोले ने दंतेवाड़ा के हीरानार में विवेकानंद आरोग्य धाम की स्थापना की। यह सिर्फ एक अस्पताल नहीं, बल्कि हजारों आदिवासियों के लिए उम्मीद की किरण है।

    • निःशुल्क चिकित्सा: यहाँ दूर-दराज के गांवों से आने वाले आदिवासियों का निःशुल्क या अत्यंत कम लागत पर इलाज किया जाता है।
    • मोतियाबिंद अभियान: डॉ. गोडबोले ने हज़ारों नेत्र रोगियों का सफल ऑपरेशन कर उन्हें नई दृष्टि प्रदान की है।
    • गंभीर बीमारियों का उपचार: मलेरिया, कुपोषण और सिकल सेल जैसी बीमारियों से जूझते बस्तर में उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर तक पहुँचाया।

    2. सुनीता गोडबोले का योगदान

    सुनीता गोडबोले ने डॉ. रामचंद्र के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। जहाँ डॉ. रामचंद्र चिकित्सा पक्ष संभालते हैं, वहीं सुनीता जी ने:

    • आश्रम और अस्पताल के प्रबंधन की जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
    • वनांचल की महिलाओं को स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया।
    • स्थानीय महिलाओं के लिए स्वरोजगार और कौशल विकास के क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान किया।

    3. विपरीत परिस्थितियों में सेवा

    बस्तर के उस दौर में काम करना, जहाँ आवागमन के साधन न के बराबर थे और सुरक्षा की गंभीर चुनौतियाँ थीं, किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन गोडबोले दंपति ने बिना किसी डर के, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और जंगलों को पार कर मरीजों तक पहुँचने का संकल्प कभी नहीं तोड़ा।

    सम्मान और उपलब्धि

    डॉ. रामचंद्र और सुनीता गोडबोले की जोड़ी को छत्तीसगढ़ का ‘अभय और रानी बंग’ (प्रसिद्ध समाजसेवी दंपति) माना जाता है।

    • पद्मश्री 2026: उनकी निरंतर सेवा के लिए उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया है।
    • राज्य सम्मान: इससे पहले भी उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

    “हमारा उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है जिसे समाज ने भुला दिया है।” — डॉ. रामचंद्र गोडबोले

    डॉ. रामचंद्र त्रयम्बक गोडबोले और सुनीता गोडबोले की कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षा और कौशल का असली उपयोग मानवता की सेवा में ही है। दंतेवाड़ा की पथरीली धरती पर उन्होंने सेवा का जो बीज बोया था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी छाया में हजारों बस्तरवासी स्वास्थ्य का लाभ ले रहे हैं।

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