रायपुर। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में विवाह की पहचान माने जाने वाले भड़ौनी गीत अब धीरे-धीरे परंपरा से ओझल होते जा रहे हैं। कभी बारात के स्वागत से लेकर हर प्रमुख रस्म तक इन गीतों की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन आज आधुनिक संगीत और डीजे संस्कृति ने इस लोक परंपरा को पीछे धकेल दिया है।
पुराने समय में जब बारात वधू पक्ष के घर पहुंचती थी, तब गीतों के माध्यम से उसका स्वागत होता था। भड़ौनी गीत केवल गाए नहीं जाते थे, बल्कि वे संवाद का माध्यम भी होते थे, जहां दोनों पक्षों के युवक-युवतियां हंसी-मजाक और व्यंग्य के जरिए एक-दूसरे से जुड़ते थे। यह परंपरा विवाह समारोह को जीवंत और आत्मीय बना देती थी।
इन गीतों में रिश्तों की मिठास और सामाजिक बंधनों की झलक साफ दिखाई देती थी। समधी-समधिन, वर-वधू और परिवारजन गीतों के जरिए एक-दूसरे से संवाद करते थे। हल्के-फुल्के तंज और हास्य से भरे ये गीत सामाजिक सामंजस्य को मजबूत करते थे।
वर्तमान समय में बदलती जीवनशैली और तकनीक के प्रभाव ने इन लोकगीतों की उपस्थिति को सीमित कर दिया है। विवाह समारोहों में अब तेज़ संगीत और फिल्मी गीतों का बोलबाला है, जिससे भड़ौनी गीतों की परंपरा धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन गीतों से अपरिचित रह जाएंगी। ऐसे में समाज को आगे आकर इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में प्रयास करना होगा।
भड़ौनी गीत (उदाहरण)
नदिया के तीर बइठे बरात,
मोर अंगना आई गे सजन के साथ।
हंसी ठिठोली गूंजे गली-गली,
आज तो होही खुशियों के बात।
अरे समधी जी, कइसे आयव,
कइतका लाज लेके आयव।
हमर गांव के रीत निराला,
गाना गाके मन बहलायव।
अरे भइया के संग आई बरात,
हंसी मजाक मा बीते रात।
नाचा-गाया सब झूम-झूम,
भड़ौनी गीत मं बसै हर बात।
माटी के महक, मया के रंग,
गांव के राग मं बसै हर ढंग।
भड़ौनी गान ला जिंदा रखव,
यही हमर परंपरा के संग।

