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    बड़ी दीदी: बुधरी ताती नक्सलगढ़ में जलती सेवा की मशाल

    हमर गोठBy हमर गोठJanuary 27, 20263 Mins Read
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    budhri-tati
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    बस्तर के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के हीरानार गांव की रहने वाली बुधरी ताती को स्थानीय लोग सम्मान और स्नेह से ‘बड़ी दीदी’ कहकर पुकारते हैं। पिछले चार दशकों (लगभग 40 वर्षों) से वे अबूझमाड़ और वनांचल के उन दुर्गम इलाकों में काम कर रही हैं, जहाँ कभी बुनियादी सुविधाओं का पहुंचना भी एक सपना था।

    1. बचपन और सेवा का संकल्प

    बुधरी ताती की सेवा यात्रा मात्र 15 वर्ष की आयु में शुरू हुई थी। उन्हें समाज सेवा की प्रेरणा हीरानार के ही गुरमगुंडा आश्रम के लखमू बाबा से मिली। समाज सेवा के प्रति उनकी ललक इतनी तीव्र थी कि उन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया और कभी विवाह नहीं किया।

    2. महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता

    बुधरी ताती का सबसे उल्लेखनीय कार्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना रहा है। उन्होंने:

    • अब तक लगभग 545 से अधिक आदिवासी महिलाओं को शिक्षित और प्रशिक्षित किया है।
    • सिलाई-कढ़ाई जैसे कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा।
    • उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षित कई युवतियां आज नर्स के रूप में स्वास्थ्य सेवाओं में अपना योगदान दे रही हैं।

    3. नशामुक्ति और सामाजिक जागरूकता

    बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में शराब और नशे की समस्या एक बड़ी चुनौती रही है। बुधरी ताती ने गांव-गांव जाकर, परिवारों के बीच बैठकर नशामुक्ति के लिए अभियान चलाया। उन्होंने लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए 400 से 500 गांवों की पैदल यात्रा की, ताकि ग्रामीणों का विश्वास जीता जा सके।

    4. शिक्षा और स्वास्थ्य की अलख

    नक्सलवाद के साये में बड़े हो रहे बच्चों के लिए शिक्षा का द्वार खोलना बुधरी ताती की प्राथमिकता रही। उन्होंने उन क्षेत्रों में स्कूलों और साक्षरता केंद्रों को बढ़ावा दिया जहाँ डर के कारण शिक्षा पहुंच नहीं पा रही थी। इसके साथ ही, वे बुजुर्गों की सेवा और स्वास्थ्य शिविरों के आयोजन में भी सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं।

    सम्मान और पुरस्कार

    पद्मश्री 2026 उनके जीवन का 23वां सम्मान है। इससे पहले उन्हें:

    • छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘वीरनी पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है।
    • राज्य और राष्ट्रीय स्तर के कई प्रतिष्ठित मंचों पर उनके कार्यों को सराहा गया है।

    “यह सम्मान मेरा नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज का है। हमने समाज के लिए काम किया और समाज हमारे साथ खड़ा रहा।” — बुधरी ताती (पद्मश्री घोषणा के बाद)


    निष्कर्ष: बुधरी ताती का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादे नेक हों, तो बंदूक की गोलियों की गूँज के बीच भी शांति और विकास की मशाल जलाई जा सकती है। आज वे बस्तर की उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणापुंज हैं जो अभावों के बीच भी बदलाव की कहानी लिखना चाहती हैं।

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