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    Home»इतिहास»बीसवीं शताब्दी का छत्तीसगढ़: राजनीतिक चेतना और उग्र राष्ट्रवाद का उदय
    इतिहास

    बीसवीं शताब्दी का छत्तीसगढ़: राजनीतिक चेतना और उग्र राष्ट्रवाद का उदय

    हमर गोठBy हमर गोठApril 21, 20262 Mins Read
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    Victoria Jubilee Townhall Raipur
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    ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो बीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्ष छत्तीसगढ़ में राजनीतिक जागृति और उथल-पुथल के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं। इस बदलाव की एक बड़ी शुरुआत वर्ष 1903 में हुई, जब प्रशासनिक स्तर पर बरार क्षेत्र को मध्य प्रांत (सेंट्रल प्रोविंस) के साथ जोड़ दिया गया। इस भौगोलिक और प्रशासनिक पुनर्गठन ने यहाँ के समूचे राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरा और दूरगामी प्रभाव डाला।

    यही वह दौर था जब मध्य प्रांत और छत्तीसगढ़ के स्थानीय नेताओं का सीधा संपर्क प्रखर राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से होने लगा था। लोकमान्य तिलक के प्रखर विचारों और उनके प्रभाव के परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ के भीतर भी स्वाधीनता आंदोलन ने एक नई ऊर्जा के साथ जोर पकड़ना शुरू कर दिया। तत्कालीन नेताओं को स्वाभाविक रूप से यह महसूस होने लगा कि ब्रिटिश हुकूमत से पूर्ण मुक्ति का मार्ग केवल उग्र राष्ट्रवाद को अपनाकर ही प्रशस्त किया जा सकता है। इस उग्र विचारधारा ने उन्हें अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जनता के मन में पनप रहे भारी असंतोष को मुखर रूप से प्रदर्शित करने का एक सशक्त और बेहतरीन अवसर प्रदान किया।

    राजनीतिक सरगर्मियों के इसी क्रम में वर्ष 1907 में रायपुर में आयोजित हुआ प्रांतीय परिषद का सम्मेलन विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। 1907 में हुए इस तीसरे प्रांतीय सम्मेलन के दौरान एक बड़ी ऐतिहासिक घटना घटी, जब दो बिल्कुल विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं वाले गुटों के बीच वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए और उनके बीच स्पष्ट रूप से फूट पड़ गई। रायपुर के इस अधिवेशन में उभरे वैचारिक टकराव का असर इतना गहरा था कि इसी मतभेद का एक व्यापक और राष्ट्रीय स्वरूप बाद में ऐतिहासिक सूरत कांग्रेस अधिवेशन में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिला।

    राष्ट्रीय राजनीति में छत्तीसगढ़ की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में वर्ष 1907 का एक और विशेष महत्व है। इसी वर्ष, छत्तीसगढ़ के प्रख्यात विचारक और स्वतंत्रता सेनानी माधवराव सप्रे ने नागपुर से ‘हिन्दी केसरी’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया था। इस समाचार पत्र का शुरू होना केवल पत्रकारिता के क्षेत्र की घटना नहीं थी, बल्कि यह इस बात को प्रमाणित करने वाला एक मजबूत साक्ष्य था कि अब प्रांतीय स्तर की राजनीति में छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बौद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व को धीरे-धीरे स्वीकार किया जाने लगा था और उसकी अहमियत बढ़ रही थी।

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