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    भाइयों के पराक्रम की गाथा: कैसे पड़ा ‘भैयाथान’ नाम

    हमर गोठBy हमर गोठApril 2, 20262 Mins Read
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    bhaiyathan
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    छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में स्थित भैयाथान केवल एक भौगोलिक नाम नहीं, बल्कि वीरता, त्याग और भाईचारे की ऐतिहासिक स्मृति को संजोए हुए है। इस नाम के पीछे दो भाइयों के अद्वितीय साहस और राज्य के प्रति उनकी निष्ठा की प्रेरक कहानी जुड़ी हुई है।

    17वीं शताब्दी में सरगुजा राज्य की राजधानी रजधानी में थी। उस समय महाराज की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर कुछ विद्रोही तत्वों ने जसपुर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। जब इस घटना की सूचना रानी को मिली, तो उन्होंने तत्काल दो वीर भाइयों को इस संकट से निपटने का दायित्व सौंपा।

    रानी के आदेश पर दोनों भाई अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए निकल पड़े और तेजी से लुंड्रा क्षेत्र के रास्ते घटनास्थल तक पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने विद्रोहियों के खिलाफ मोर्चा संभाला और घमासान युद्ध हुआ। इस संघर्ष में दोनों भाइयों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए बड़ी संख्या में शत्रुओं को परास्त किया।

    हालांकि, इस युद्ध में उन्हें भी भारी क्षति उठानी पड़ी, लेकिन अंततः उन्होंने विद्रोहियों को खदेड़कर क्षेत्र को मुक्त करा लिया। कुछ समय बाद जब सरगुजा के महाराज लौटे और पूरी स्थिति से अवगत हुए, तो वे दोनों भाइयों के पराक्रम और निष्ठा से अत्यंत प्रभावित हुए।

    महाराज ने उनके इस योगदान के सम्मान में उन्हें सरगुजा के पूर्वी भाग में हिलमीली नामक क्षेत्र की जागीर प्रदान की। उस समय यह इलाका बालंद शासकों के अधीन था। दोनों भाइयों ने रिहंद नदी के तट पर बसे क्षेत्र में न केवल अपनी जागीर को विकसित किया, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में शांति और व्यवस्था भी स्थापित की।

    उनकी वीरता और योगदान को स्मरणीय बनाने के लिए इस क्षेत्र का नाम ‘भैयाथान’ रखा गया, जो आज भी उनके साहस और भाईचारे की कहानी को जीवित रखे हुए है। यह स्थान इतिहास के उन पन्नों की याद दिलाता है, जहां कर्तव्य और पराक्रम ने मिलकर एक नई पहचान गढ़ी।

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