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छत्तीसगढ़ की गौरवशाली संस्कृति को प्रदर्शित करता ढोकरा कला

छत्तीसगढ़ की गौरवशाली संस्कृति को प्रदर्शित करता ढोकरा कला

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ विभिन्न कलाओं व संस्कृतियों का मिश्रण देखने को मिलता है। सभी प्रकार की कलाएँ किसी-न-किसी रूप में इतिहास से जुडक़र अपनी गौरवशाली गाथा का बखान करती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले की ढोकरा कला भी इन्हीं कलाओं में से एक है। इस कला का दूसरा नाम घढ़वा कला भी है। यह कला प्राचीन होने के साथ-साथ असाधारण भी है। छत्तीसगढ़ की ढोकरा कला को सन 2014 से ज्योग्राफिकल इंडिकेटर यानि भौगोलिक संकेतक जिसे जीआई टैग कहते हैं, प्राप्त है। जी आई टैग किसी भी रीजन के क्षेत्रीय उत्पाद को एक विशेष पहचान देता है।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र कला और संस्कृति में अत्यंत धनी है। ढोकरा कला छत्तीसगढ़ के कोण्डागाँव जिले में विशेष रूप से पाई जाती है। छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से आदिवासी जनजातियां ही रहा करती हैं। ढोकरा कला की विशेषता है, जिसकी प्रत्येक अंश पर कलाकार की कलाकारी की जटिलता इसे अलग ही प्रामाणिकता प्रदान करती है। इसे ग्राहकों को आकर्षक बनाती है इसकी लोक शैली। ढोकरा कला जानवरों के आदिवासी विषयों, पौराणिक जीवों, मानव जीवों, और प्राकृतिक आकारो से प्रेरित है।ढोकरा कला दस्तकारी की एक प्राचीन कला है। इसमें पुरानी मोम-कास्टिंग तकनीक का उपयोग करके मूर्तियाँ बनाईं जाती हैं।

2012 में बस्तर जिले के कोंडागाँव से अलग हुए भेलवापारा मोहल्ले में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो ढोकरा शिल्प से बनी मूर्तियों में अपनी कला को प्रगट करते हैं। इन शिल्पकारों के कारण ढोकरा शिल्पकला की पहचान देश और विदेश तक पहुंच गई है।

ऐसे तैयार होती है ढोकरा आर्ट की मूर्तियां

बस्तर की बेल मेटल, काष्ठ  कला और ढोकरा आर्ट पूरे देश में प्रसिद्ध है खासकर ढोकरा आर्ट की मूर्तियों की काफी डिमांड है। देश के बड़े महानगरों में बकायदा ढोकरा आर्ट के शोरूम भी हैं। शोरूम आदिवासियों के बनाए ढोकरा आर्ट की मूर्तियों की काफी डिमांड है। इसमें शिल्प मोम (मधुमक्खियों का वैक्स) की ढलाई की तकनीक के माध्यम से धातु कला का कार्य होता है। इसमें एक प्रकार के स्क्रैप और अनुपयोगी धातु का उपयोग किया जाता है।यह पर्यावरण हितैषी शिल्पकला है।ढोकरा आर्ट को बनाने में करीब 15 प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

अधिकतर ढोकरा शिल्पकला में आदिवासी संस्कृति की छाप होती है। देवी देवताओं और पशु आकृतियों में हाथी, घोड़े, हिरण, नंदी, गाय और मनुष्य की आकृति होती है। इसके अलावा शेर, मछली, कछुआ, मोर भी बनाए जाते हैं। लैदुराम के मुताबिक ढोकरा आर्ट की एक मूर्ति बनाने में एक दिन का समय लगता है। सबसे पहले चरण में मिट्टी का प्रयोग होता है और मिट्टी से ढांचा तैयार किया जाता है। काली मिट्टी को भूंसे के साथ मिलाकर बेस बनता है और मिट्टी के सूखने पर लाल मिट्टी की लेप लगाई जाती है।

लाल मिट्टी से लेपाई करने के बाद मोम का लेप लगाते हैं। मोम के सूखने पर अगले प्रोसेस में मोम के पतले धागे से बारीक डिजाइन बनाई जाती है और सूखने पर अगले चरण में मूर्ति को मिट्टी से ढक देते हैं। इसके बाद सुखाते के लिए धूप का सहारा लेना होता है। धूप में सुखाने के बाद फिर मिट्टी से ढकते हैं। अगले चरण में ऊपर से दो-तीन मिट्टी से कवर करने के बाद पीतल, टिन, तांबे जैसी धातुओं को पहले हजार डिग्री सेल्सियस पर गर्म कर पिघलाया जाता है।

धातु को पिघलाने में चार से पांच घंटे का समय लगता है। पूरी तरह पिघलने के साथ ही ढांचा को अलग भट्टी में गर्म करते हैं। तरह गर्म होने पर मिट्टी के अंदर का मोम पिघलने लगता है। खाली स्थान पर पिघलाई धातु को ढांचे में धीरे धीरे डाला जाता है और मोम की जगह को पीतल से ढक दिया जाता है. फिर 4 से 6 घंटे तक ठंडे होने के लिए रखा जाता है।

ठंडा होने के बाद छेनी- हथौड़ी से मिट्टी निकालने के लिए ब्रश से साफ किया जाता है और इसके बाद मूर्तियों पर पॉलिश किया जाता है। इन सब प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही ढोकरा आर्ट की मूर्तियां पूरी तरह से तैयार होती हैं और इसकी फिनिशिंग की वजह से बस्तर के ढोकरा आर्ट की काफी डिमांड होती है।

ऐतिहासिक सभ्यता में भी मिलती है झलक

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यताओं के अवशेषों में ढोकरा शिल्प की खोज की गई है,जो इसके ऐतिहासिक और पारंपरिक महत्व को साबित करता है। खुदाई में मोम की कलाकृतियों में से एक मोहनजोदड़ो की नृत्यांगना की मूर्ति मिली। मोहनजोदड़ो में मिली यह नाचती हुई लड़की की मूर्ति, शिल्प की उत्पत्ति और निरंतरता का प्रमाण है। यही परंपरा की निरंतरता, कला की दृढ़ता और जीवन शक्ति, ढोकरा उत्पादों को प्रतिष्ठित बनाता है।

ढोकरा और घड़वा जनजाति

छत्तीसगढ़ में ढोकरा मुख्यतः घड़वा जनजाति बनाती है। घड़वा जानजाति को लेकर एक दिलचस्प लोक कथा है। एक बार एक शिल्पकार ने बस्तर के शासक भानचंद की पत्नी को तोहफ़े में एक ढोकरा हार दिया। तभी राजा का ध्यान इस अनोखी कला की तरफ़ गया। शिल्पकार का सम्मान करने के उद्देश्य से शासक ने उसे घड़वा का ख़िताब दे दिया। ये शब्द संभव: गलना से लिया गया था जिसका मतलब होता है पिघलना और मोम का काम। कहा जाता है कि तब से यहां ढोकरा कला का काम होने लगा। बस्तर की ढोकरा कलाकृतियों में ढोकरा सांड या बैल सबसे प्रसिद्ध मूर्ति मानी जाती है। छत्तीसगढ़ की ढोकरा शैली में विशेष लंबी मानव आकृतियाँ बनती हैं। इसके अलावा आदिवासी और हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं।

इन विशेष कला और संस्कृतियों को वर्तमान में प्रासंगिक बनाए रखने और लुप्त होने से बचाने के लिए इसका संरक्षण और प्रचार प्रसार अत्यंत आवश्यक है। इन्हें विश्व स्तर पर भी पहचान मिलनी चाहिए और देश इसके लिए प्रयासरत है।

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