छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र के पास स्थित कोरगांव अपने अनोखे “कुकुर मंदिर” के लिए जाना जाता है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वफादारी और समर्पण की ऐसी कहानी को संजोए हुए है, जो आज भी लोगों को भावुक कर देती है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, पहले इस क्षेत्र में बंजारा समुदाय के लोग अपने पशुओं के साथ निवास करते थे। वे जीविकोपार्जन के लिए गांव-गांव घूमते और कभी-कभी अपने धन-सामान को सुरक्षित रखने के लिए किसी विश्वसनीय व्यक्ति के पास गिरवी रख देते थे। इसी क्रम में एक बंजारे ने अपना कीमती सामान एक सेठ के पास गिरवी रखा और सुरक्षा के लिए अपना कुत्ता वहीं छोड़ दिया।
कहा जाता है कि एक रात सेठ के घर चोरी हो गई। कुत्ते ने अपनी सूझबूझ और वफादारी का परिचय देते हुए चोरों का पीछा किया और उनके छिपाए गए धन तक पहुंच गया। अगले दिन वह कुत्ता सेठ को उस स्थान तक ले गया, जहां चोरी का सामान छिपाया गया था। इस घटना से प्रभावित होकर सेठ ने कुत्ते की निष्ठा को सराहा और बंजारे को उसका सामान लौटाने का निर्णय लिया।
सेठ ने कुत्ते के गले में एक पत्र बांधकर उसे उसके मालिक के पास भेज दिया, जिसमें पूरी घटना का विवरण लिखा था। लेकिन दुर्भाग्यवश, जब कुत्ता अपने मालिक के पास पहुंचा, तो बंजारे ने बिना कुछ समझे उसे चोरों का साथी समझ लिया और क्रोध में आकर उसकी हत्या कर दी। बाद में जब उसने पत्र पढ़ा, तो उसे अपनी भूल का एहसास हुआ और वह पश्चाताप से भर गया।
कुत्ते की वफादारी और अपनी गलती के प्रायश्चित स्वरूप, बंजारे ने उसी स्थान पर कुत्ते की स्मृति में एक मंदिर का निर्माण करवाया। तब से यह स्थल “कुत्ता मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी यहां आने वाले लोग उस वफादार कुत्ते की कहानी सुनते हैं और उसकी निष्ठा को नमन करते हैं।
समय के साथ यह मंदिर जर्जर अवस्था में पहुंच गया है, लेकिन इसकी कहानी आज भी उतनी ही जीवंत है। यह स्थान न केवल एक धार्मिक धरोहर है, बल्कि मानवीय भावनाओं, विश्वास और वफादारी का अद्भुत प्रतीक भी है।
