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बस्तर हस्तशिल्प: आदिवासी कला का अनूठा भंडार

बस्तर हस्तशिल्प: आदिवासी कला का अनूठा भंडार

बस्तर अंचल का हस्तशिल्प, चाहे वे आदिवासी हस्तशिल्प हों या लोक हस्तशिल्प, दुनिया-भर के कलाप्रेमियों का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम रहा हैं। बस्तर शिल्प की दीवार दुनिया भर में कला उत्साही और विशेषज्ञ का ध्यान आकर्षित करते हैं।

बस्तर हस्तशिल्प की विशेषताएं

बस्तर हस्तशिल्प की अपनी विशेषताएं हैं, जो इसे अन्य हस्तशिल्पों से अलग करती हैं। इन विशेषताओं में शामिल हैं:

  • आदिवासी संस्कृति का प्रतिबिंब: बस्तर हस्तशिल्प आदिवासी संस्कृति का एक जीवंत प्रतिबिंब है। इन कलाकृतियों में आदिवासियों की जीवन शैली, उनकी मान्यताएं, और उनकी कला और संस्कृति का सुंदर चित्रण किया गया है।
  • प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग: बस्तर हस्तशिल्प में प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक उपयोग किया जाता है। इन कलाकृतियों को बनाने के लिए लकड़ी, बांस, मिट्टी, धातु, और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है।
  • सौंदर्य और कलात्मकता: बस्तर हस्तशिल्प अपनी सौंदर्य और कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं। इन कलाकृतियों में जटिल और सुंदर डिजाइन और पैटर्न का उपयोग किया जाता है।

बस्तर हस्तशिल्प के प्रकार

बस्तर हस्तशिल्प को कई प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • काष्ठ शिल्प: बस्तर काष्ठ शिल्प विश्व प्रसिद्ध है। काष्ठ शिल्प में मुख्य रूप से लकड़ी के फर्नीचरों में बस्तर की संस्कृति, त्योहारों, जीव जंतुओं, देवी देवताओं की कलाकृति बनाना, देवी देवताओं की मूर्तियां, साज सज्जा की कलाकृतियाँ बनायीं जाती है।
  • बांस शिल्प: बस्तर में बांस शिल्प के अनेक परंपरागत कलाकार है। बांस कला में बांस की शीखों से कुर्सियां, बैठक, टेबल, टोकरियाँ, चटाई, और घरेलू साज सज्जा की सामग्रिया बनायीं जाती है।
  • मिट्टी शिल्प: बस्तर का मिट्टी शिल्प अपनी विशेष पहचान रखता है। इसमें देवी देवताओं की मूर्तियाँ, सजावटी बर्तन, फूलदान, गमले, और घरेलु साज-सज्जा की सामग्रियां बनायी जाती है।
  • धातु शिल्प: धातु शिल्प में ताम्बे और टिन मिश्रित धातु के ढलाई किये हुए कलाकृतियाँ बनायीं जाती है, जिसमे मुख्य रूप से देवी देवताओं की मूर्तियाँ, पूजा पात्र, जनजातीय संस्कृति की मूर्तियाँ, और घरेलु साज-सज्जा की सामग्रियां बनायीं जाती है।
  • घड़वा कला: घड़वा शिल्प के अंतर्गत देवी व पशु-पक्षी की आकृतियां तथा त्यौहारों में उपयोग आने वाले वाद्य सामग्री तथा अन्य घरेलू उपयोग वस्तुएं आती है।
  • लौह शिल्प: बस्तर में लौह शिल्प का कार्य लोहार जाति के लोग करते है। बस्तर में मुरिया माड़िया आदिवासियों के विभिन्न अनुष्ठानों में लोहे से बने स्तम्भों के साथ देवी-देवता, पशु-पक्षियों व नाग आदि की मूर्तियां प्रदत्त की जाती है।
  • तीर धनुष कला: धनुष पर लोहे की किसी गरम सलाख से जलाकर कालात्मक अंलकरण बनाने की परिपाटी बस्तर के मुरिया आदिवासी में देखने को मिलता है।
  • प्रस्तर शिल्प: बस्तर इस शिल्प के मामले में भी विशेष स्थिति रखता है। यहां का चित्रकूट क्षेत्र तो अपने प्रस्तर शिल्प के लिये विशेष रूप से प्रसिद्ध है। जंहा कई प्रकार के प्रस्तर शिल्प प्राप्त किया जा सकता हैं।
  • मुखौटा कला: मुखौटा मुख का प्रतिरूप है। बस्तर के मुरिया जनजाति के मुखौटे आनुष्ठानिक नृत्यों के लिये बनाये जाते हैं। भतरा जनजाति के भतरानाट में विभिन्न मुखौटों का प्रचलन है।


बस्तर हस्तशिल्प का महत्व

बस्तर हस्तशिल्प का सांस्कृतिक, आर्थिक और कलात्मक महत्व है। यह आदिवासी संस्कृति को संरक्षित रखने और दुनिया तक पहुंचाने में मदद करता है। साथ ही, यह बस्तर के हस्तकलाकारों के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। बस्तर हस्तशिल्प न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं और इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

बस्तर की कला आत्माएं: हस्तशिल्प को जीवन देने वाले

बस्तर हस्तशिल्प अपनी सुंदरता और जटिलता के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन वे केवल सुंदर वस्तुओं से ज्यादा हैं। वे उस रचनात्मकता और कौशल के प्रमाण हैं जिसने उन्हें पीढ़ियों से पारित किया है। इस लेख में, हम बस्तर के कुछ उल्लेखनीय हस्तशिल्प कलाकारों को श्रद्धांजलि देते हैं, जिनके हाथों से ये विस्मयकारी कलाकृतियां जन्म लेती हैं:

1. जयदेव बघेल: बस्तर के लोकप्रिय शिल्पकारों में से एक, जयदेव बघेल मिट्टी और लकड़ी से बनी देवी-देवताओं और जनजातीय जीवन की आकृतियों के लिए जाने जाते हैं। उनकी उत्कृष्ट नक्काशी और अद्वितीय शैली ने उन्हें मास्टर क्राफ्ट्समैन नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया है।

2. सोनाबाई: सरगुजा जिले की निवासी, सोनाबाई मिट्टी के शिल्पों की एक माहिर हैं। उनकी मिट्टी की मूर्तियों में आदिवासी जीवन के दृश्य, जानवर और देवी-देवता अविश्वसनीय रूप से विस्तृत और जीवंत होते हैं। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

3. गोविन्द राम झारा: रायगढ़ के एकताल गांव के रहने वाले, गोविन्द राम झारा पीतल की घंटियों और मूर्तियों के लिए विख्यात हैं। उनकी धातु की कलाकृतियां पारंपरिक डिजाइनों और आधुनिक संवेदनशीलता का एक सुंदर संतुलन प्रस्तुत करती हैं।

4. शम्भू: नारायणपुर जिले के रहने वाले शम्भू एक प्रतिभाशाली मिट्टी शिल्पकार हैं। उनके हाथों से निर्मित मिट्टी के पशु-पक्षी और घरेलू सामान प्रकृति की नकल करते हुए नाजुकता और मजबूती का अद्भुत मेल प्रदर्शित करते हैं।

5. देवनाथ: एड़का गांव के रहने वाले देवनाथ मिट्टी के जानवरों, विशेष रूप से हाथियों, बनाने में माहिर हैं। उनकी जटिल नक्काशी और सजीव डिजाइन इन्हें बस्तर के सबसे कुशल मिट्टी शिल्पकारों में से एक बनाते हैं।

ये कुछ ही नाम हैं, बस्तर में अनगिनत प्रतिभाशाली हस्तशिल्प कलाकार हैं, जिनकी कहानियां सुनाई जाएं और जिनकी कौशल की सराहना की जाए। उनकी कड़ी मेहनत और समर्पण बस्तर हस्तशिल्प को जीवित रखता है और दुनिया भर के कला प्रेमियों को चकित करता है।

हमें यह याद रखना चाहिए कि बस्तर हस्तशिल्प सिर्फ कलाकृतियां नहीं हैं, बल्कि बस्तर के लोगों की समृद्ध संस्कृति और परंपरा का प्रतिबिंब हैं। इन कलाकारों का समर्थन करके, हम न केवल अपनी विरासत को संरक्षित करते हैं, बल्कि उनकी आजीविका और कला को जीवित रखने में भी योगदान देते हैं।

बस्तर हस्तशिल्प की चुनौतियां और संरक्षण

बस्तर हस्तशिल्प को बचाए रखने में कुछ चुनौतियां भी हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • आधुनिकीकरण का प्रभाव: आधुनिकीकरण के दौर में पारंपरिक हस्तशिल्प कलाओं को संरक्षित करना मुश्किल हो सकता है। युवा पीढ़ी पारंपरिक हस्तशिल्पों को कम अपना रही है, जिससे इन कलाओं के लुप्त होने का खतरा है।
  • कच्चे माल की कमी: बस्तर हस्तशिल्प में प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक उपयोग किया जाता है। इन संसाधनों की कमी से हस्तशिल्प कलाकारों को मुश्किलें आती हैं।
  • बाजार का अभाव: बस्तर हस्तशिल्प के लिए स्थानीय बाजार सीमित है। इन कलाकृतियों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने की जरूरत है।

बस्तर हस्तशिल्प की इन चुनौतियों से निपटने के लिए, सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा कई प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों में शामिल हैं:

  • हस्तशिल्प कलाकारों का प्रशिक्षण: हस्तशिल्प कलाकारों को कौशल विकास प्रशिक्षण देकर उन्हें बेहतर तरीके से तैयार किया जा रहा है।
  • कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाना: कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
  • बाजार का विस्तार: बस्तर हस्तशिल्प को बड़े बाजारों तक पहुंचाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
  • पर्यटन को बढ़ावा देना: बस्तर के हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इन प्रयासों से बस्तर हस्तशिल्प को बचाए रखने और उन्हें समृद्ध बनाने में मदद मिलेगी। बस्तर हस्तशिल्प न केवल बस्तर की एक अनमोल विरासत है, बल्कि भारत की संस्कृति का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम सब की जिम्मेदारी है कि इस अनमोल विरासत को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाएं।

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