छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर आयोजित होने वाला “चक्रधर समारोह” एक ऐसा सांस्कृतिक उत्सव है, जो कला, संगीत और साहित्य के प्रति गहरी श्रद्धा को दर्शाता है। यह समारोह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि संगीत सम्राट महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और उनके योगदान को श्रद्धांजलि है।
इतिहास और ऐतिहासिक महत्व
चक्रधर समारोह का अपना एक गहरा ऐतिहासिक महत्व भी है। आजादी से पहले, रायगढ़ एक स्वतंत्र रियासत थी, जो अपनी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध थी। इसी रियासत से प्रसिद्ध संगीतज्ञ कुमार गंधर्व और हिंदी के पहले छायावादी कवि मधुकर पांडेय जैसे महान कलाकार जुड़े थे। जब सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से रियासतों के भारत में विलीनीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, तो रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह विलीनीकरण के सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर करने वाले पहले शासकों में से एक थे।
महाराजा चक्रधर सिंह न केवल एक कुशल शासक थे, बल्कि वे एक महान संगीतज्ञ और कला पारखी भी थे। उनके प्रयासों और प्रोत्साहन के कारण ही संगीत और नृत्य की एक नई शैली विकसित हुई। वे स्वयं एक कुशल तबला वादक, नर्तक और लेखक थे। उनके दरबार में देश के जाने-माने कलाकार आते-जाते रहते थे। उन्होंने कथक की लखनऊ और जयपुर शैलियों के सम्मिश्रण से “रायगढ़ घराना” नामक कथक की एक नई शैली को जन्म दिया।
समारोह का उदय
स्वतंत्रता-पूर्व काल से ही गणेशोत्सव के समय यहां सांस्कृतिक आयोजनों की एक समृद्ध परंपरा विकसित हुई, जिसने धीरे-धीरे एक बड़े महोत्सव का रूप ले लिया। यह आयोजन इतना वृहद था कि राजा चक्रधर सिंह के निधन के बाद उनकी याद में “चक्रधर समारोह” के नाम से यहां के कलासाधकों ने वर्ष 1985 से दस दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत की। इस समारोह ने देश के सांस्कृतिक मानचित्र पर छत्तीसगढ़ को स्थापित करने में बड़ी मदद की। 2001 से, जिला प्रशासन ने इस आयोजन का जिम्मा संभाला और इसे एक व्यापक स्वरूप प्रदान किया है।
कला और संस्कृति का अद्भुत संगम
चक्रधर समारोह में हर साल देश-विदेश के शीर्षस्थ कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। शास्त्रीय संगीत, नृत्य, लोक कलाओं, काव्य पाठ और नाटकों का यह अनूठा मंच कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर देता है। कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्यों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य जैसे कर्मा और पंडवानी भी इस समारोह का हिस्सा बनते हैं। इसके अलावा, समारोह में कुश्ती और कबड्डी जैसी पारंपरिक खेल प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है, जो महाराजा चक्रधर सिंह के खेल प्रेम को दर्शाते हैं।
रायगढ़ की पहचान
चक्रधर समारोह ने रायगढ़ को “छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी” के रूप में एक नई पहचान दी है। यह समारोह न केवल कला और संस्कृति को बढ़ावा देता है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध विरासत से जोड़ने का भी एक माध्यम है। हर साल गणेश चतुर्थी के समय रायगढ़ शहर रोशनी से जगमगा उठता है और पूरा शहर कला के रंग में डूब जाता है। यह समारोह कला प्रेमियों के लिए एक ऐसा अवसर है, जहां वे एक ही मंच पर देश की सांस्कृतिक विविधता का अनुभव कर सकते हैं।