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गुरु घासीदास: छत्तीसगढ़ के संत, समाज सुधारक और सत्य के नायक

गुरु घासीदास: छत्तीसगढ़ के संत, समाज सुधारक और सत्य के नायक

छत्तीसगढ़ की धरती को कई महान हस्तियों ने जन्म दिया है, जिनमें सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास का नाम उज्ज्वल है। 18 दिसंबर 1756 को गिरौदपुरी गांव में जन्मे गुरु घासीदास ने अपने विचारों और कार्यों से न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत को प्रभावित किया।

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उठाई आवाज:

गुरु घासीदास उस समय पैदा हुए थे जब समाज में जाति-पाति का भेदभाव, छुआछूत जैसी कुरीतियां और अंधविश्वास का बोलबाला था। उन्होंने इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ निर्भीक होकर आवाज उठाई। उनका मानना था कि हर इंसान को समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए, चाहे उसका जाति-धर्म कुछ भी हो। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया और कहा कि सच्चा भगवान तो हमारे अंदर ही निवास करता है।

सतनाम पंथ की स्थापना:

गुरु घासीदास ने 1820 में सतनाम पंथ की स्थापना की, जो एक मानवतावादी और समतावादी धर्म है। इस पंथ का मूल सिद्धांत “एक सतनाम” यानि एक सच्चा ईश्वर है। उन्होंने मूर्ति पूजा की जगह नाम जप को प्रधानता दी और सत्य, अहिंसा, करुणा और परिश्रम पर जोर दिया।

शिक्षा और ज्ञान का प्रसार:

गुरु घासीदास किसी स्कूल या संस्थान से शिक्षा नहीं ग्रहण कर सके, लेकिन उनके अंदर ज्ञान का अथाह समुद्र था। उन्होंने समाज को अंधविश्वास और अनभिज्ञता के अंधकार से निकालने का प्रयास किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की स्थानीय भाषाओं में ही प्रवचन दिए, ताकि उनकी बातें आम जन तक आसानी से पहुंच सकें। उन्होंने नित्य नियम, श्रम कर्म और ईमानदारी पर बल दिया।

समाज सेवा का संदेश:

गुरु घासीदास समाज सेवा पर बेहद जोर देते थे। उन्होंने गरीबों, असहायों और वंचित वर्गों की मदद करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सच्ची धर्म सेवा सिर्फ मंदिरों में जाने या पूजा-पाठ करने से नहीं होती, बल्कि मानव सेवा से होती है।

गुरु घासीदास का प्रभाव:

गुरु घासीदास का छत्तीसगढ़ के सामाजिक और धार्मिक जीवन पर अमिट छाप है। उनके विचारों और कार्यों ने समाज में जागरूकता लाई और छुआछूत जैसी कुरीतियों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी शिक्षाएं आधुनिक समाज में भी प्रासंगिक हैं और हमें सामाजिक सद्भाव, समानता और मानवता का पाठ पढ़ाती हैं।

यादें और प्रतीक:

गुरु घासीदास की जयंती प्रतिवर्ष 18 दिसंबर को पूरे छत्तीसगढ़ में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन लोग जैतखाम (सफेद रंग के झंडे के साथ लकड़ी का ढेर) की पूजा करते हैं, जो सत्य के प्रतीक के रूप में माना जाता है। उनके अनुयायी गुरु घासीदास के सिद्धांतों का पालन करते हैं और समाज में उनकी शिक्षाओं को फैलाने का प्रयास करते हैं।

गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ के गौरव हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चा परिवर्तन सिर्फ विचारों से नहीं, बल्कि कार्यों से आता है। उनके साहस, समर्पण और मानवता के संदेश को हमें हमेशा याद रखना चाहिए।

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